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बुधवार, 24 जून 2009

मैं कार्ल मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की इतनी सरल प्रस्तुति सुन रही थी…

जैक लंडन का उपन्यास - देखें : \’आयरन हील\’

और अतिरिक्त मूल्य का नियम

सपने का गणित

अर्नेस्ट के उद्घाटन से लोग मानो भौंचक रह गए. इस बीच उसने फिर शुरू किया :
‘आप में से दर्जनों ने कहा कि समाजवाद असंभव है. आपने असम्भाविता पर जोर दिया है. मैं अनिवार्यता को चिन्हित कर रहा हूँ. न केवल यह अनिवार्य है कि आप छोटे पूंजीपति विलुप्त हो जायेंगे – बड़े पूंजीपति और ट्रस्ट भी नहीं बचेंगे. याद रखो विकास की धारा पीछे नहीं लोटती. वह आगे ही बढ़ती जाती है, प्रतियोगिता से संयोजन की ओर, छोटे संयोजन से बड़े संयोजन की ओर, फिर विराट संयोजन की ओर और फिर समाजवाद की ओर जो सबसे विराट संयोजन है.

‘आप कह रहे हैं कि मैं सपना देख रहा हूँ. ठीक है मैं अपने सपने का गणित प्रस्तुत कर रहा हूँ और यहीं मैं पहले से आपको चुनौती दे रहा हूँ कि आप मेरे गणित को गलत साबित करें. मैं पूंजीवादी व्यवस्था के ध्वंस की अनिवार्यता प्रमाणित करूंगा और मैं इसे गणितीय ढंग से प्रमाणित करूंगा. मैं शुरू कर रहा हूँ. थोडा धैर्य रखें, अगर शुरू में यह अप्रासंगिक लगे.

‘पहले हम किसी एक औद्योगिक प्रक्रिया की खोजबीन करें और जब भी आप मेरी किसी बात से असहमत हों, फ़ौरन हस्तक्षेप कर दें. एक जूते की फैक्टरी को लें. वहां लैदर जूता बनाया जाता है. मान लीजिए सौ डालर का चमडा खरीदा गया. फैक्टरी में उसके जूते बनें. दो सौ डालर के. हुआ क्या ? चमड़े के दाम सौ डालर में सौ डालर और जुड गया. कैसे ? आईए देखें.

पूंजी और श्रम ने जो सौ डालर जोड़े. पूंजी ने फैक्टरी, मशीने जुटाई, सारे खर्चे किए. श्रम ने श्रम जुटाया. दोनों के संयुक्त प्रयास से सौ डालर मूल्य जुडा. आप अब तक सहमत हैं? ‘

सब ने स्वीकार में गर्दन हिलाई.

‘पूंजी और श्रम इस सौ डालर का विभाजन करते हैं. इस विभाजन के आंकडे थोड़े महीन होंगे. तो आईए मोटा-मोटा हिसाब करें. पूंजी और श्रम पचास-पचास डालर बाँट लेते हैं. इस विभाजन में हुए विवाद में नहीं पड़ेंगे. यह भी याद रखें कि यह प्रक्रिया सभी उद्योगों में होती है. ठीक है न ? ‘

फिर सब ने स्वीकृति में गर्दन हिलाई.

‘अब मान लीजिए मजदूर जूते खरीदना चाहें तो पचास डालर के जूते खरीद सकते हैं. स्पष्ट है.’

‘अब हम किसी एक प्रक्रिया की जगह अमेरिका की सभी प्रक्रियाओं की कुल प्रक्रिया को लें जिसमें चमडा, कच्चा माल, परिवहन सब कुछ हो. मान लें अमेरिका में साल भर में चार अरब के धन का उत्पादन होता है. तो उस दौरान मजदूर ने दो अरब की मजदूरी पाई. चार अरब का उत्पादन जिसमें से मजदूरों को मिला — दो अरब — इसमें तो कोई बहस नहीं होनी चाहिए वैसे पूंजीपतियों की ढेरों चालों की वजह से मजदूरों को आधा भी कभी नहीं मिल पाता. पर चलिए मान लेते हैं कि आधा यानि दो अरब मिला मजदूरों को. तर्क तो यही कहेगा कि मजदूर दो अरब का उपयोग कर सकते हैं. लेकिन दो अरब का हिसाब बाकी है जो मजदूर नहीं पा सकता और इसलिए नहीं खर्च कर सकता.’

‘मजदूर. अपने दो अरब भी नहीं खर्च करता — क्योंकि तब वह बचत खाते में जमा क्या करेगा ? कोबाल्ट बोला.’

‘मजदूर का बचत खाता एक प्रकार का रिजर्व फंड होता है जो जितनी जल्दी बनता है उतनी जल्दी ख़त्म हो जाता है. यह बचत वृद्धा अवस्था, बीमारी, दुर्घटना और अंत्येष्टि के लिए की जाती है. बचत रोटी के उस टुकड़े की तरह होती है जिसे अगले दिन खाने के लिए बचा कर रखा जाता है. मजदूर वह सारा ही खर्च कर देता है जो मजदूरी में पाता है.’

‘दो अरब पूंजीपति के पास चले जाते हैं. खर्चों के बाद सारे का क्या वह, उपभोग कर लेता है ? क्या अपने सारे दो अरब का उपभोग करता है. अर्नेस्ट ने रूककर कई लोगों से दो टूक पूछा. सब ने सिर हिला दिया.

‘मैं नहीं जानता.’ एक ने साफ़-साफ़ कह दिया.

‘आप निश्चित ही जानते हैं. क्षण भर के लिए जरा सोचिए. अगर पूंजीपति सब का उपभोग कर ले तो पूंजी बढेगी कैसे ? अगर आप देश के इतिहास पर नज़र डालें तो आप देखेंगे कि पूंजी लगातार बढ़ती गयी है. इसलिए पूंजीपति सारे का उपभोग नहीं करता. आप को याद है जब इंग्लैंड के पास हमारी रेल के अधिकांश बांड थे. फिर हम उन्हें खरीदते गए. इसका क्या मतलब हुआ ? उन्हें उस पूंजी से ख़रीदा गया जिसका उपभोग नहीं हुआ था. इस बात का क्या मतलब है कि यूनाइटेड स्टेट्स के पास मैक्सिको, इटली और रूस के करोडों बांड हैं ? मतलब है कि वे लाखों करोडों वह पूंजी है जिसका पूंजीपतियों ने उपभोग नहीं किया. इसके अलावा पूंजीवाद के प्रारंभ से ही पूंजीपति ने कभी अपना सारा हिस्सा खर्च नहीं किया है.’

अब हम मुख्य मुद्दे पर आयें. अमेरिका में एक साल चार अरब के धन का उत्पादन होता है. मजदूर उसमें से दो अरब पाता है और खर्च कर देता है. पूंजीपति शेष दो अरब खर्च नहीं करता. भारी हिस्सा बचा रह जाता है. इस बचे अंश का क्या होता है ? इससे क्या हो सकता है ? मजदूर इसमें से कुछ खर्च नहीं कर सकता. क्योंकि उसने तो अपनी सारी मजदूरी खर्च कर दी है. पूंजीपति जितना खर्च कर सकता है, करता है; फिर भी बचा रह जाता है. तो इसका क्या हो ? क्या होता है?

‘एकदम ठीक! इसी शेष के लिए हमें विदेशी बाज़ार की ज़रुरत होती है. उसे विदेशों में बेचा जाता है. वही किया जा सकता है. उसे खर्चने का ओर उपाय नहीं है. और यही उपर्युक्त अतिरिक्त धन जो विदेशों में बेचा जाता है हमारी लिए सकारात्मक व्यापार संतुलन कहलाता है. क्या हम यहाँ तक सहमत हैं ?’

‘इस व्यवसाय के क, ख, ग से ही मैं आपको चकित करूंगा. यहीं. अमेरिका एक पूंजीवादी देश है जिसमें अपने संसाधनों का विकास किया है. अपनी पूंजीवादी औद्योगिक व्यवस्था से उसके पास काफी धन बच जाता है जिसका वह उपभोग नहीं कर पाता. उसे विदेशों में खर्च करना ज़रूरी है. यही बात दूसरे पूंजीवादी देशों के बारे में भी सच है. अगर उनके संसाधन विकसित हैं तो यह न भूलें कि आपस में खूब व्यापार करते हैं फिर भी अतिरिक्त काफी बच जाता है. इन देशों में मजदूर सारी मजदूरी खर्च कर देता है और इस बचे हुए अतिरिक्त को खरीदने में असमर्थ है. इन देशों में पूंजीपति जितना भी उपयोग कर सकते हैं करते हैं फिर भी बहुत कुछ बच जाता है. इस अतिरिक्त धन को वे एक दूसरे को नहीं दे सकते. फिर उसका वे क्या करें?’

‘उन्हें अविकसित संसाधनों वाले देशों में बेच दें.’ कोबाल्ट बोला.

‘एकदम यह ठीक है. मेरा तर्क इतना स्पष्ट और सीधा है कि आप स्वयं मेरा काम आसान कर रहे हैं. अब अगला कदम ! मान लिया यूनाइटेड स्टेट्स अपने अतिरिक्त धन को एक अविकसित देश जैसे ब्राजील में लगाता है. याद रखें यह अतिरिक्त उस व्यापार से अलग है जिसका इस्तेमाल हो चूका है. तो उसके बदले में ब्राजील से क्या मिलता है?’

‘सोना’ कोबाल्ट बोला.

‘लेकिन दुनिया में सोना तो सीमित है !’ अर्नेस्ट ने एतराज किया.

‘आप पहुँच गए. ब्राजील से अमेरिका अपने अतिरिक्त धन के बदले में लेता है सिक्युरिटी और बांड. इसका मतलब है अमेरिका ब्राजील रेल, फैक्ट्रियों, खदानों का मालिक बन सकता है. और तब इसका क्या मतलब हुआ ?’

कोबाल्ट सोचने लगा पर नहीं सोच पाया तथा नकारात्मक में सिर हिला दिया.

‘मैं बताता हूँ. इसका मतलब हुआ ब्राजील के संसाधन विकसित किए जा रहे हैं. जब ब्राजील पूंजीवादी व्यवस्था में अपने संसाधन विकसित कर लेगा तो उसके पास भी अतिरिक्त धन बचने लगेगा. क्या वह इसे अमेरिका में लगा सकता है ? नहीं क्योंकि उसके पास तो अपना ही अतिरिक्त धन है. तो क्या अमेरिका अपना अतिरिक्त धन पहले की ही तरह ब्राजील में लगा सकता है ? नहीं ; क्योंकि अब तो स्वयं ब्राजील के पास अतिरिक्त धन है.

‘ तब क्या होता है ? इन दोनों को तीसरा अविकसित देश ढूँढना पड़ेगा जहाँ से वे अपना सरप्लस उलीच सकें. इस क्रम से उनके पास भी अतिरिक्त धन बचने लगेगा. महानुभाव गौर करें धरती इतनी बड़ी तो है नहीं. देशों की संख्या सीमित है. तब क्या होगा जब छोटे से छोटे देश में भी कुछ अतिरिक्त बचने लगेगा?’

उसने रूककर श्रोताओं पर एक नज़र डाली. उनके चेहरों पर हवाईयां उड़ रही थीं. थोडा उसे मज़ा आया. जितने बिम्ब खींचे थे अर्नेस्ट ने उनमें से कई उन्हें डरा रहे थे.

मिस्टर काल्विन हमने ए बी सी से शुरू किया था. मैंने अब सारे अक्षर सामने रख दिए हैं. यही तो इसका सौन्दर्य है. क्या होगा जब देश के पास अतिरिक्त बचा रह जायेगा ओर आपकी पूंजीवादी व्यवस्था का क्या होगा ?’

अर्नेस्ट ने फिर शुरू किया :

‘ मैं अपनी बात संक्षेप में दोहरा दूं. हमने एक विशेष औद्योगिक प्रक्रिया से बात शुरू की थी. एक जूता फैक्ट्री से हमने पाया कि जो हाल वहां है वही सारे औद्योगिक जगत में हैं. हमने पाया कि मजदूर को उत्पादन का एक हिस्सा मिलता है जिसे वह पूरी तरह खर्च कर देता है और पूंजीपति पूरा खर्च नहीं कर पाता. बचे हुए अतिरिक्त धन के लिए विदेशी बाज़ार अनिवार्य है. इस निवेश से वह देश भी अतिरिक्त पैदा करने में सक्षम हो जायेगा. जब एक दिन सभी इस स्थिति में पहुँच जायेंगे तो अंतत: इस अतिरिक्त का क्या होगा?

किसी ने जवाब नहीं दिया.

‘काल्विन महोदय !’

‘मुझे समझ नहीं आ रहा.’ उसने स्वीकारा.

‘मैंने तो यह सपने में भी नहीं सोचा था पर यह तो एकदम स्पष्ट लग रहा है.’ ऐसमुनसेन ने कहा.

मैं कार्ल मार्क्स के अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत की इतनी सरल प्रस्तुति सुन रही थी और मैं स्तब्ध और चकित बैठी थी…

इतिहास बोध प्रकाशन
बी-239, चन्द्रशेखर आजाद नगर
इलाहाबाद – 211004
दूरभाष : 0532/2546769 से प्रकाशित ‘आयरन हील’ – जैक लंडन
से साभार