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मंगलवार, 9 जून 2009

कांग्रेस की जीत…अफलातून और सुरेश चिपलूनकर… कुछ विशेष टिप्पणियों का सामान्य जवाब

कड़ी जोड़ने के लिए देखे :

“कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …की टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में

“हमने लिखा
“आज से 40-50 साल पहले देहाती विशेषकर किसान को बेवकूफ समझा जाता था, इसलिए नहीं कि वास्तव में किसान या देहाती बेवकूफ होते हैं…..साथ ही हमने जोड़ा था कि “वह किसान रहा हो जो बीज को शुष्क, या भिगोकर, गहरे में या धरती के ऊपर बिखेरकर और हर मौसम, हर प्रकार की भूमि में उसे उगाने का ज्ञान रखता था.”
किसी प्रकार की गलतफहमी न हो हम साफ़ कर देना चाहते हैं कि;

आज के किसान का चरित्र वह नहीं है जो तब था और वह मजदूर के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक क्रांति का वाहक था जो नहीं हुई. इसके विपरीत राष्ट्रीय जनतंत्र के कार्यभार ने बुर्जुआ राज्य और बुर्जुआ सरकारों के नेतृत्व में प्रशियाई जुन्कर तरीके से धीमे परन्तु पीडादायक तरीके से संपन्न होना था और वह हुआ भी. इस दौरान किसान उस मेहनतकश के क्रांतिकारी चरित्र को खो बैठा जो कि मजदूर वर्ग की सहायक रिजर्व सेना का होता है. पूँजी का सताया यह वर्ग यदि क्रांतिकारी दीखता है तो केवल इसलिए क्योंकि मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण से अपना दृष्टिकोण त्यागकर यह अपना भविष्य सुरक्षित कर लेना चाहता है. हम इसका स्वागत करते हैं परंतु मजदूरों के हितों को ताक में रखकर इनके बोनुस, लाभकारी मूल्यों की हिफाजत की वकालत हम नहीं करते. हाँ, बुर्जुआ राज्य द्वारा राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पूँजी की चाकरी बजाते हुए पुलिस और फौज द्वारा इनके हासिल जनतांत्रिक अधिकारों के हनन की हम भर्त्सना करते हैं बेशक किसी लाल झंडे के नेतृत्व में कामरेडों ने वह कर दिखाया हो जिसे करने में बुर्जुआ दल भी शरमातें हैं.

हमने बार-बार लिखा है कि सीपीआई, सीपीआई (एम) सीपीआई (एम एल ) संशोधनवादी पार्टियाँ हैं और इनका चरित्र बुर्जुआ पार्टियों से कहीं ज्यादा, कहीं अधिक कुटील है लेकिन इनकी कतारों की बहुसंख्यक गिनती और इनके समर्थक बुद्धिजीवियों की बहुसंख्या, अब भी ईमानदार है हालाँकि ,किसी भी वस्तु, घटनावृत अथवा व्यापार की गतिकी की दशा-दिशा इस बात पर निर्भर करती है कि वस्तु, घटनावृत अथवा व्यापार के बुनियादी मुख्य विरोधी ध्रुवों में प्रधानता किसकी है. इस घटनावृत को ठीक इसी प्रकार समझा जा सकता है जैसे किसी समाज में मेहनतकश अवाम तो बहुसंख्यक हो लेकिन उस समाज की विरोधों की एकता से पैदा होने वाली गतिकी उसके पक्ष के विपरीत अल्पसंख्यक परजीवी वर्गों के पक्ष में हल होती हो.

लेकिन निम्नलिखित रिपोर्ट में वर्णित तथ्य भी गौर करने लायक हैं ;

1990 के दशक में, सी.पी.एम. की चंडीगढ़ में संपन्न हुई पंद्रहवीं कांग्रेस में एक चौकाने वाला तथ्य प्रकाश में आया. पार्टी के आधे से ज्यादा सदस्य गैर-मेहनतकश वर्ग और गैर-किसान वर्ग से आये थे या यूं कहें कि – मिडल क्लास से. इससे सी.पी.एम. की मेहनतकश वर्गों को जन-आंदोलनों में न खींच सकने की क्षमता और उसके रेडिकल शिक्षित युवा की और आकर्षण का पता चलता है. उस समय से जारी इस नुक्स और बेपरवाही के चलते हालत यह हो गयी है कि विद्यार्थियों, युवायों और महिलायों के मोर्चे ही लगभग सभी पोलित ब्यूरो और संसद के टॉप नेताओं की आपूर्ति करते हैं. नव युवाओं में शायद ही कोई सदस्य हो जो ट्रेड यूनियन, किसान और जन-आन्दोलन से उठकर आया हो. हरकिशन सिंह सुरजीत और ज्योति बसु किसान और श्रमिक वर्ग आंदोलनों से उभरे थे जबकि प्रकाश करात और बुद्धदेव भट्टाचार्य विश्वविद्यालयों के कुलीन वर्ग से आये हैं. पार्टी में इस मालदार शिक्षित वर्ग की प्रधानता ने पार्टी को ,जिसे कहा जा सकता है कि, “तर्कसंगत सिद्धांतों की राजनीति” में बदल दिया…देखें : A Logical Defeat

कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी कम्युनिस्टों के इस प्रकार अलग-अलग खेमों में बँटे होने से चिंतित हो जाते हैं. हालाँकि कुछ विशेष परस्थितियों में ‘टैक्टिस’ के लिहाज़ से यहाँ तक कि जनतांत्रिक बुर्जुआ दलों तक के साथ सांझे मोर्चे के लिए समझौता करने से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन समझौता आखिर समझौता ही होता है जो कभी भी किसी पक्ष को, एक पल के लिए भी, पीडामुक्त नहीं करता और उसे दशकों तक निभाना (यहाँ इशारा भारतीय वाम मोर्चा से है) हद दर्जे की निम्न अवसरवादिता नहीं तो और क्या है?

जहाँ तक सैद्धांतिक एकता का प्रश्न है तो मजदूरों के लिए लेनिन के कहे गए इन शब्दों का आज भी उतना ही महत्त्व है,

“मज़दूरों को एकता की ज़रूरत अवश्य है और इस बात को समझना महत्त्वपूर्ण है कि उन्हें छोड़कर और कोई भी उन्हें यह एकता ‘प्रदान’ नहीं कर सकता, कोई भी एकता प्राप्त करने में उनकी सहायता नहीं कर सकता। एकता स्थापित करने का ‘वचन’ नहीं दिया जा सकता – यह झूठा दम्भ होगा, आत्मप्रवंचना होगी (एकता बुद्धिजीवी ग्रुपों के बीच ‘समझौतों’ द्वारा ‘पैदा’ नहीं की जा सकती। ऐसा सोचना गहन रूप से दुखद, भोलापन भरा और अज्ञानता भरा भ्रम है।” “एकता को लड़कर जीतना होगा, और उसे स्वयं मज़दूर ही, वर्गचेतन मज़दूर ही अपने दृढ़, अथक परिश्रम द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। इससे ज्यादा आसान दूसरी चीज़ नहीं हो सकती है कि ‘एकता’ शब्द को गज-गज भर लम्बे अक्षरों में लिखा जाये, उसका वचन दिया जाये और अपने को ‘एकता’ का पक्षधर घोषित किया जाये।”

शब्द कम्युनिस्ट से अभिप्राय सत्तासीन दल के शेयर होल्डर रहे संशोधनवादी वामपंथी धडे और दुस्साहसवादियों से लिया जाता हैं. हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि छिटपुट ही सही परंतु कुछ क्रांतिकारी ग्रुप उपरोक्त दो धाराओं से बिलकुल हटके हैं लेकिन इसका मतलब हरगिज़ नहीं कि कोई नया मार्क्सवाद ईजाद कर लिया गया है बल्कि आज विपर्य के इस दौर में मार्क्सवाद की हिफाजित तथाकथित मार्क्सवादियों से करने की सख्त ज़रुरत है और इन संशोधनवादी मार्क्सवादियों को नंगा करना क्रांतिकारी ग्रुपों का एक कार्यभार है जबकि दुस्साहसवाद इतना कुटील नहीं, उसे हराया जा सकता है. जहाँ तक सर्वहारा वर्ग की क्रांतिकारी पार्टी के होने न होने का सवाल है, इसके लिए देखें : कहाँ से फूटेंगी उम्मीद की किरणें

हमारे कर्मों का मार्गदर्शक होते हुए मार्क्सवाद निरंतर विकासमान सिद्धांत है जिसे समय-समय पर कर्म-सिद्धांत-कर्म के सूत्र द्वारा एंगेल्स, लेनिन, स्तालिन माओ आदि मार्क्सवादियों ने विकसित किया है. वैज्ञानिक समाजवाद के प्रथम प्रयोग हार जाने के बाद, नई समाजवादी क्रान्तियों (समाजवादी क्रांतियाँ – क्योंकि 21वीं शताब्दी 20वीं शताब्दी से इसलिए भिन्न है कि दुनिया के लगभग प्रत्येक हिस्से में पूंजीवाद विकसित हो चूका है) का अगला चक्र शुरू ही होने वाला है.

मार्क्सवाद को असफल नहीं माना जा सकता अलबता मजदूर वर्ग का इस संक्रमण दौर में बुर्जुआओं से हार जाने का अर्थ केवल यही है कि समाजवादी क्रांतियों का प्रथम चक्र पूरा हो गया है और सर्वहारा वर्ग अगले चक्र की तैयारी की इस प्रचंड झंझावाती समय की पूर्वबेला से पहले सोया हुआ दीखता है लेकिन यह मान लेना कि मजदूरवर्ग नए समाजवादी क्रांतियों के तजुर्बे नहीं करेगा क्योंकि समाजवाद तो फेल हो चुका है , क्रांतिकारियों के लिए भाग्यवादी और पलायनवादी – हाथ पर हाथ रखकर बैठना होगा जबकि इसके विपरीत मजदूर वर्ग बड़ी शिद्दत के साथ समाजवादी क्रांतियों की इस प्रक्रिया को अंजाम देगा – बेशक हजारों-हज़ार क्रांतियाँ फेल हो जाएँ क्योंकि बुर्जुआ वर्ग अपने-आप तो उसे यह मौका देगा नहीं कि आओ मैं तुम्हें सिखाता हूँ कि राज्य का संचालन कैसे किया जाता है ! ऐसे में सर्वहारा के पास हारी हुई क्रांतियों के निष्कर्ष और निष्पत्तियों का समाहार करते हुए और मार्क्सवाद की कसौटी पर इसे आत्मसात करते हुए नए समाजवादी तजुर्बे करने और सीखने के सिवा और कोई चारा नहीं है. इसी प्रक्रिया द्वारा ही मार्क्सवाद एक कट्ठ्मुल्लापन (dogma) होने के विपरीत अभ्यास-सिद्धांत-अभ्यास द्वारा अपने विकास की उच्चतर मंजिल को छूएगा और यह क्रांतियों के पिछले रोल मॉडल रहे फ्रेमवर्कों को तहस नहस कर डालेगा.

सुरेश चिपलूनकर [ Suresh Chiplunkar ] के इन शब्दों “बहरहाल, अकेले प्याज़ के मुद्दे पर जब भाजपा सरकार गिर सकती है तो सभी वस्तुओं के गत 5 साल में तीन गुना महंगे होने पर भी सरकार का न गिरना “आश्चर्यजनक” क्यों नहीं है, यह मैं समझना चाहूँगा… वह भी आसान भाषा में, बोझिल भाषा में नहीं” का हम स्वागत करते हैं. हमने लिखा था

“वैसे सुरेश जी महंगाई से अनुभववादी तरीके से परेशान हो जाते हैं, ये महंगाई, ज़रा खोलकर हमें भी बताएं कि महंगाई कम होगी तो उस मजदूर वर्ग की जिसे प्रधानमंत्री 20 रूपए से कम पर गुजारा करते बताते हैं मजदूरी कम क्यों नहीं होगी ? बात ज़रा सिद्धांत की है सिद्धांत के क्षेत्र में रहकर एक राजनितिक अर्थशास्त्री की नज़र से ज़बाब दीजिएगा.”

पूंजीवादी में महंगाई कोई नया घटनावृत नहीं है. दशकों बीत गए जब मुंबईया फिल्मों में ‘बाकी कुछ बचा तो महंगाई मार गयी’, लोगों ने सुना और महंगाई की इस परिघटना को पूंजीवाद के एक ज़रूरी लक्षण के रूप में स्वीकार किया. दरअसल, पेट्टी-बुर्जुआ बुर्जुआओँ का सताया होने के कारण महंगाई -महंगाई चिल्लाने लगता है जबकि वस्तुओं और मजदूरी की दर सरकार द्वारा तय न होकर क्लासिकीय पूंजीवादी व्यवस्था में (इस क्लासिकीय पूंजीवाद के चेहरे को लोक-हितेषी दिखाने हेतू, 1930 की पहली विश्व महामंदी से डरे पूंजीवाद को बचाने के लिए कीन्स समाजवाद से उधार लेकर नुस्खे-टोटके प्रगट हुए थे जिसे बुर्जुआ राज्यों ने नवउदारवादी दौर में फैंक दिया. विडम्बना यह है कि पूंजीवाद कीन्स के नुस्खों-टोटकों की ओर वापस भी नहीं लौट सकता) मार्केट द्वारा मांग और पूर्ति के नियमानुसार निर्धारित होती हैं जिसे पूंजीवाद में निहित कई फैक्टर प्रभावित करते हैं क्योंकि मांग और पूर्ति अपने-आप वस्तुओं और मज़दूरी की दर तय नहीं कर सकती. पूंजीपतियों के चाटुकार बुद्धिजीवियों को भारत जैसे देश में, बेहद सस्ती दरों पर श्रम शक्ति का उपलब्ध होने का कारण, यहाँ की बढ़ी हुई जनसंख्या में दीखता है जबकि इसका राज प्रधानमंत्री के उस वक्तव्य में निहित है कि यहाँ की 70 प्रतिशत आबादी 20 या 20 रूपए से कम पर गुज़ारा करती है. श्रम-शक्ति के पुनरुत्थान के लिए इतना कम खर्च बहुत ही कम देशों में होता है. बहरहाल, कहना इतना ही है कि पूंजीवाद में, श्रम-शक्ति भी अन्य वस्तुओं की तरह एक जिंस (commodity) होती है और उसके पुनरुत्थान का खर्च या श्रम-शक्ति का मूल्य उसके पुनरुत्थान पर लगे सामाजिक ज़रूरी श्रम-समय (Socially necessary labor time) के बराबर होता है.

महंगाई से हम न केवल चिंतित हैं बल्कि इसकी सबसे ज्यादा मार सर्वहारा वर्ग पर ही पड़ने के कारण पीड़ित भी हैं लेकिन पेट्टी-बुर्जुआ के वर्ग दृष्टिकोण के अनुसार बिलकुल नहीं. चरित्र में भारत जैसी ही पूंजीवादी दृष्टिकोण अनुसार तेजी से विकास की और अग्रसर विश्व की ब्राजील, अर्जेंटीना, मेक्सिको, चीले, द. अफ्रीका, नाईजिरिया, मिस्त्र, ईरान, तुर्की, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलिप्पीन्स, भारत आदि लगभग दर्ज़न एक अर्थव्यवस्थाओं को, मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण अनुसार, दुनिया के सबसे सस्ते मुल्को में शुमार करते हैं क्योंकि पूंजी द्वारा यहाँ उपलब्ध श्रम-शक्ति का अँध-शोषण, बेहद सस्ती दरों पर किया जाता है. सस्ती श्रम-शक्ति होने के कारण सस्ती जिन्से उपलब्ध करवाना केवल इन्हीं मुल्कों के बस की ही बात है. ये देश दुनिया के विकसित पूंजीवादी देशों के मुकाबले में सस्ती उपभोक्तावादी जिंसों का धडाधड उत्पादन कर रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी पूँजी के इस खेल में देशी पूंजीपति मिलकर सर्वहारा वर्ग का कचूमर निकाले हुए हैं जिसे हम विकास के नाम पर अनदेखा नहीं कर सकते. इस लिहाज से हमारा यह कहना कि भारत मुकाबलतन महंगा देश न होकर एक सस्ता देश है कहाँ गलत है ? क्या इसकी पुष्टि वे नहीं करते जिनके पास डॉलर हैं ? उपरी वर्गों की तो छोडिये मध्यम वर्ग के जीवन स्तर की 1970 की दशा और उसकी वर्तमान उपभोक्तावादी स्थिति की तुलना कीजिए. अब जरा सर्वहारा वर्ग जिसके बारे में प्रधानमंत्री जी बीस रूपए से कम गुजारा करने वाला वर्ग बताते हैं उसके 1970 के जीवन स्तर और आज के जीवन स्तर की तुलना कीजिए. क्या उसने उन चरागाहों को नहीं खो दिया जहाँ वह अपनी भेड़ बकरियां चराकर गुज़र-बसर कर लिया करता था? क्या उसके नीचे से उसकी झोंपडी की ज़मीन नहीं खिसक गयी है?

लेकिन हम सत्तर या उसके पीछे की दलदल में वापस लौटने का भी इरादा नहीं रखते हैं. कुछ महानुभावों की यादों में “अहा ग्राम्य जीवन’ का नोस्टालिजिया हो सकता है वे हमसे उसी नोस्टालिजिया में जीने की स्वतंत्रता की मांग कर सकते हैं जिसका हमें कोई शिकवा नहीं है लेकिन हम भी उनसे, लेनिन की भाषा की मदद लेकर, कहना चाहते हैं कि ऐ महानुभावों ! आप उस दलदल में लौट जाना चाहते हैं, आपको वहाँ लौटने की पूरी स्वतंत्रता और हक़ है लेकिन हम भी स्वतन्त्र हैं कि आप को उस दलदल में छोड़कर आगे बढे, हमें पूरा हक़ है कि, मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण अनुसार, इस पूंजीवाद के दानवी चेहरे से लोक-हितेषी मेक-अप का पर्दाफाश करें क्योंकि पूंजीवाद मेहनतकश अवाम की जीवनचर्या को पहले से कहीं ज्यादा बदतर, पहले से कहीं ज्यादा दुष्कर बनाए जा रहा है. विकास के नाम पर जिसमे पेट्टी-बुर्जुआ अपने दिलो-दिमाग को पूंजीपति टोली के साथ मिलाकर रखता है और विकास-विकास की चिल्ल-पौ मचाता रहता है लेकिन जब पूँजी अपने तर्क द्वारा उसे हजम कर जाती है तो वह चिल्लाने लग जाता है पर फिर भी वह अपने पेट्टी-बुर्जुआ दृष्टिकोण का त्याग नहीं करता – मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण को नहीं अपनाता, का उपहास उडाने की हमें भी पूरी स्वतंत्रता है. हम सर्वहारा वर्ग से आह्वान करते हैं कि पूंजी के इस दुश्चक्र को तोड़कर ही, वह केवल और केवल समाजवादी क्रांति द्वारा समाज और इतिहास को आगे गति दे सकता है क्योंकि पूंजी अपने ही तर्क द्वारा अप्रासंगिक हो चुकी है , यदि वह प्रासंगिक है तो केवल उसके हरकत में न होने से है.

विज्ञान की प्रत्येक शाखा की अपनी एक अलग शब्दावली होती है. फिजिक्स, कैमिस्ट्री या जीवविज्ञान का अध्ययन करते समय नए विद्यार्थियों को उनके कुछ शब्द सीखने पड़ते हैं. इसी प्रकार राजनीती और समाजशास्त्र के सिद्धांतों के अध्ययन के वक्त सम्बंधित शब्दावली की गैर-मौजूदगी में ये विषय बेहद “बोझिल” और कठिन लगते हैं. सुरेश चिपलूनकर कहते हैं;

“मैं तो एक मूढ़ व्यक्ति हूँ”, न तो मैं बड़ी-बड़ी ना समझ में आने वाली पुस्तकें पढ़ता हूँ, न ही वैसा लिख पाता हूँ… :) । मैंने तो अपनी असफ़लता को भी खुल्लमखुल्ला स्वीकार किया है” और वे मांग करते हैं कि “मैं समझना चाहूँगा… वह भी आसान भाषा में, बोझिल भाषा में नहीं…।”

विज्ञान की भाषा विज्ञान के युग में वैज्ञानिक न होगी तो कैसी होगी. क्या हम रोजमर्रा की खाने-पीने और अघाने वाली भाषा द्वारा इसका अध्ययन-मनन कर सकते हैं ? यह मेहनत से जी चुराना नहीं तो और क्या है? यह सब पलायनवाद नहीं तो और क्या है ?

रहा सवाल, मजदूर वर्ग द्वारा इस भारी-भरकम शब्दाबली को सीखने-समझने का तो इतना ही कहना काफी है कि मार्क्स की ‘पूंजी’ छपते ही, जर्मन की मजदूर जमात में लोकप्रिय हो गयी थी. हाँ, प्रोफेसरों को इसे समझने-पढने में जो दिक्कत आती है उसके बारे में हम कुछ कह नहीं सकते. मौजूदा समय विपर्य का दौर है – मजदूर वर्ग की लहर का दौर नहीं. बुद्धिजीवी वर्ग के लिए इस तरह के दौर का इतिहास में बड़ा महत्त्व रहा है क्योंकि इस शांति भरे दौर (?) में वह चिन्तन-मनन करने के लिए काफी समय निकाल सकता है. जहाँ तक लहर के दौर का सवाल है तो उस वक्त सर्वहारा वर्ग यह नहीं देखता कि मार्क्स, लेनिन, माओ आदि ने क्या कहा. वह देखता है तो अपने हित ! उस वक्त समस्या होती है तो बुद्धिजीवी वर्ग के लिए. सैद्धांतिक अस्त्र से रहित उसके प्रतिक्रियावादियों के हाथों खेल जाने की पूरी-पूरी संभावना होती है जबकि इसके विपरीत अगर वह सिद्धांत से चाक-चौबंद होता है तो क्रांति और समाज को आगे की ओर गति देने वाली उस वाहक शक्ति को वह, सही दिशा प्रदान कर सकता है और एक नए युग का सूत्रपात करने में अपनी भूमिका निभा सकता है, ठीक वैसे ही जैसे एक प्रसूति-विशेषज्ञ की भूमिका जनन-पीड़ाओं को कम करने की होती है.

दूसरा सवाल कि सिद्धांत को अमल द्वारा कैसे परखा जाये तो इतना ही कहना काफी है कि मार्क्सवाद कोई एकेडमिक चीज तो है नहीं ! इसे परखने की लैब तो यह समाज ही है. इसके लिए बस इतना ही, कि आमलेट खाने के लिए अंडा तो फोड़ना ही होगा.

अंत में एक बार फिर, हम बुद्धिजीवी वर्ग का आह्वान करते हैं कि वह आगे बढे और इस संजीदा बहस को संजीदगी के साथ ही आगे बढाए.

नोट : श्रम-शक्ति अन्य वस्तुओं की तरह एक जिंस (commodity) होती तो है लेकिन अन्य जिंसो से इसलिए अलग है कि इसे मनुष्य के शरीर से अलग नहीं किया जा सकता और दूसरी जिंसों के विपरीत यह अकेली ऐसी जिन्स है जो बेशी मूल्य या अतिरिक्त मूल्य या अधिशेष (surplus value) पैदा करती है.

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शुक्रवार, 5 जून 2009

“कांग्रेस की जीत पर अफलातून और सुरेश चिपलूनकर के दुःख में हम भी शरीक होते मगर …की टिप्पणियों के प्रत्युत्तर में

इस पोस्ट से सम्बंधित प्राप्त टिप्पणियों के पश्चात् यह ज़रूरी हो गया है कि इस विषय पर वाद-विवाद जारी रखा जाये. चूंकि वर्तमान समाज वर्गों में विभाजित है इसलिए समाज में विचारों और दृष्टिकोण की विभिन्नता होना स्वाभाविक और लाजिम है; कि विचारों की विभिन्नता और उनके बीच जारी संघर्ष विचारों के विकास की ज़रूरी शर्त है. कला नैतिकता, धर्म, राजनीति, दर्शन आदि ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में मौजूद विचार चेतना के ही रूप हैं. हालाँकि सामाजिक चेतना का कोई भी रूप वस्तुगत यथार्थ से स्वतन्त्र नहीं होता बल्कि मानवी दिमाग अन्दर वस्तुगत यथार्थ का ही प्रतिबिम्बन होता है. सर्वहारा वर्ग के नव पुनर्जागरण और सर्वहारा वर्ग के नवप्रबोधन का यह आधुनिक दौर समाज, राजनीति और संस्कृति आदि विषयों पर बुद्धिजीवी वर्ग से पहले के मुकाबले में कहीं अधिक संजीदगी की मांग करता है. अफ़सोस तब होता है जब विद्वान् कहलवाने वाले कुछ सज्जन बिना जाँच-परख किए और निम्न दर्जे के फतवे जारी करते हुए अपनी घोर अज्ञानता और असहनशीलता का प्रगटावा करते हुए दिखाई देते हैं.

लोकसभा चुनावों में जीत-हार के विश्लेषण की अपेक्षा पूंजीवादी जनतंत्र के नाम खेले जाने वाले इस खेल में, आम आदमी के साथ होने वाले छल को समझना ज़्यादा ज़रूरी है. आर्थिक असमानता की इस प्रणाली में राजनितिक अधिकारों की असमानता का जो हश्र होता है, वह किसी व्याख्या की मांग नहीं करता. बेहद खर्चीले इन चुनावों में बड़ी-बड़ी पूंजीवादी पार्टियाँ स्टार खिलाडी की हैसियत से सबसे ज्यादा पैसा बहाती हैं. क्षेत्रीय पूंजीपतियों की पार्टियाँ और निम्न बुर्जुआ विचारधारा की छोटी पार्टियाँ भी अपनी क्षमता से अधिक जोर-आजमाईश करती हैं. वामपंथी पार्टियाँ जो देश के कुछ भागों में असरदायक हैं, ने कभी भी मजदूरों और किसानों के संघर्षों को आर्थिक संघर्षों के दायरे से बाहर नहीं आने दिया. राजनीती के क्षेत्र में भी इनकी कार्रवाही सामाजिक-जनवाद यानिकि छोटे-मोटे आर्थिक सुधारों की लडाई तक सिमिट कर रह गयी है. ‘राज्य’ के चरित्र का ठोस विश्लेषण करके, देश में जारी वर्ग संघर्ष में, अलग-अलग वर्गों की पार्टियों का ठोस विश्लेषण करके, समाजवादी क्रांति का कोई प्रोग्राम ड्राफ्ट करना तो इनके एजेंडा पर रह ही नहीं गया है . पूंजीपति वर्गों द्वारा प्रायोजित किए जाने वाले जनतंत्र के इस खेल में, ये भी अपनी किस्मत-आजमाईश के लिए प्रयत्नशील रहते हैं.

वैश्वीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के इस दौर में आम लोगों की कंगाली और बदहाली में कई गुना बढोत्तरी हो चुकी है.

देश के कई हिस्सों, विशेषतय: पश्चिमी बंगाल में किसानों में वामपंथ का काफी प्रभाव रहा है. कृषि में पूंजीवादी विकास ने किसानी क्षेत्र में जो आक्रोश पैदा किया है, कभी वामपंथ उस आक्रोश का प्रतिनिधित्व करता रहा है जबकि अब इस किसान वर्ग का प्रतिनिधित्व अन्य निम्न-बुर्जुआ हाथों में जाता हुआ साफ दीखाई दे रहा है.

इन चुनावों में 10 हज़ार करोड़ रूपए से अधिक की राशिः के ‘इन्वेस्ट’ (?) होने की रिपोर्टें हैं. पूंजीवादी ढांचे के अर्न्तगत बड़ा उत्पादक निरंतर छोटे उत्पादक को हड़प करता रहता है लेकिन अपनी विशेष आवश्यकताओं के मद्देनज़र बड़े उत्पादक को, किसी हद तक, छोटे उत्पादक की निरंतर आवश्यकता बनी रहती है. इसलिए नष्ट होने के साथ-साथ छोटा उत्पादक नए-नए रूपों में, जन्म भी लेता रहता है. जहाँ तक प्रतिस्पर्द्धा का सम्बन्ध है, छोटा उत्पादक बड़े उत्पादक के मुकाबले टिक नहीं पाता बल्कि अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए बड़े उत्पादक के रहमोकर्म पर आश्रित और श्रापित होता है. राजनीती में यही अमल सीधे-सरल रूप से तो नहीं पर बड़े ही जटिल ढंग से प्रतिबिंबित होता है. लेकिन पूंजीवाद का बुनियादी स्वभाव यहाँ पर भी कायम रहता है. बड़े पूंजीपतियों की पार्टियों के समक्ष छोटे पूंजीपतियों की पार्टियों का जमें रहना, इतना आसान नहीं होता. पूंजीवादी चुनावों में छोटी पूंजीवादी पार्टियों का वही हाल होता है जो पूंजीवादी उत्पादन के क्षेत्र में छोटे उत्पादकों का होता है. इन चुनावों में करोड़पति प्रतिनिधियों की संख्या पहले से कहीं अधिक है और शेष बचे हुए सांसद करोड़पतियों के बफादार सेवादारों की हैसियत से, ससंद में पहुंचे हैं.

जहाँ तक विश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों का सम्बन्ध है, लगभग सभी संसदमार्गी पार्टियों के बीच आम सहमति बन गयी है – यहाँ तक कि वामपंथी पार्टियाँ भी, सैद्धांतिक विरोध के बावजूद, अमल में इन्हें लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. बंगाल की मिसाल तो सामने है ही, केंद्र में भी वामपंथी पार्टियों की हिमायत से चलने वाली पिछली श्री मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा भी यह अमल निर्बाध रूप से जारी रहा. हाँ, अपने-अपने वोट-बैंक के हिसाब-किताब के साथ-साथ, इन सभी पार्टियों के दरमियान, इन नीतियों को लागू करने सम्बन्धी तौर-तरीकों बारे मतभेद रहे हैं.

संसदीय चुनाव, बहुसंख्यक आबादी की इच्छा का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं. इस सारे अमल में, आम आदमी की हालत का अंदाजा पाठक स्वयं लगा सकते हैं! जहाँ तक आम आदमी के स्वयं समझने का सवाल है, वह पहले से कहीं अधिक बेहतर ढंग से समझे हुए है.

जब आम आदमी की बात हो रही हो तो तब हमारे कुछ विद्वान् बुद्धिजीवी सज्जन मेहनतकश वर्ग के बारे में बड़ी ही अजीब किस्म की धारणा पाले बैठे हैं. वे आम लोगों को अनपढ, गंवार या पता नहीं और किन-किन खिताबों से नवाजते हैं. आओ ज़रा हकीकत पर नज़र डालें.

पढाई या ज्ञान का बुनियादी मकसद, जिन्दा रहने या मानव के विकास के लिए, ज़रूरी वस्तुओं के उत्पादन के ढंग-तरीकों की खोज करना था. आरंभिक काल से, इसी मकसद के लिए, श्रम को अमल में लाने हेतू, सामूहिक सरगर्मी को अपनाते हुए ही भाषा का जन्म हुआ. श्रम के अमल में आने के कारण, मानव पशु जगत से अलग हुआ और चिंतनशील प्राणी के रूप में, इस ब्रह्माण्ड के रंगमंच पर प्रगट हुआ. मानव चिंतन की पहली आवश्यकता या मानवी चिंतन की उत्पति, जिन्दा रहने के लिए उत्पादन की आवश्यकता से ही पैदा हुई.

आज भी मजदूर जो जटिल मशीनरी की बारीकियों को समझ सकता है, खेत मजदूर या किसान (केवल मेहनतकश) अति आधुनिक बीज तैयार कर सकता है, उसे अनपढ, गंवार कहना, अपनी अज्ञानता की नुमाईश करना नहीं तो और क्या है ?

जिस तरह यूरोप में, प्राचीन सामंतशाही को ख़त्म करने के लिए एक दौर गतिमान हुआ जिसके परिणामस्वरूप पुनर्जागरण और प्रबोधन का एक दौर भी गतिमान हुआ और जिसका नतीजा बुर्जुआ इन्कलाब हुए और आधुनिक बुर्जुआ जनतंत्रों की स्थापना हुई थी इसी प्रकार भारत में [ देखें : 1857, आरंभिक देशभक्ति और प्रगतिशीलता PDF File ]भी अपने ढंग की बौद्धिक सरगरमियां चलती रही हैं जिनकी तुलना (हर तुलना लंगडी होती है) कुछ भारतीय विद्वानों ने यूरोप के पुनर्जागरण और प्रबोधन से की है. यहाँ नोट करने वाली बात यह है कि बस्तीवादी घटनावृत ने हमारे देश में उस वक्त जारी इस घटनावृत को, बीच राह में ही कत्ल कर दिया या यूं कहें की उसकी भ्रूण हत्या हो गयी जिसकि परिणति, भारत के यूरोप से अलग किस्म के बौद्धिक अमल से गुजरने में हुई. विशेष ऐतिहासिक परस्थितियों के परिणामस्वरूप, हमारे यहाँ के बुद्धिजीवी, बड़े संभल-संभलकर चलने वाले, अपनी सुख-सुविधाओं के छिनने से डरते हुए, एक विशेष किस्म की सुविधाभोगी मानसिकता से ग्रस्त रहे हैं.

हम ईमानदार और जिंदा-ज़मीर के बुद्धिजीवियों से अपील करते हैं कि इतिहास की इस सच्चाई को समझने और पचाने की कोशिश करें. मजदूर वर्ग और मेहनतकश वर्गों को , राजनितिक तौर पर शिक्षित करने के लिए, आपकी सेवाओ की ज़रुरत है. आज हमारे देश में और विश्व स्तर पर भी, सर्वहारा नवपुनर्जागरण और प्रबोधन के अमल में बुद्धिजीविओं को अपना फ़र्ज़ पहचानना होगा.

…शेष अगली किश्त

‘कांग्रेस की जीत…अफलातून और सुरेश चिपलूनकर…

कुछ विशेष टिप्पणियों का सामान्य जवाब’

में समाप्य

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